बेटी का बराबर हिस्सा
बेटी जन्म से ही बेटे के बराबर हिस्सेदार है।
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कानून क्या कहता है
- हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956, धारा 6 (2005 का संशोधन): बेटी जन्म से ही पैतृक संपत्ति में बेटे के बराबर हिस्सेदार है।
- सुप्रीम कोर्ट (विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा, 2020): यह हक़ तब भी है जब पिता 9.9.2005 को जीवित न रहे हों।
- बिना वसीयत के गुज़र जाने पर ख़ुद की कमाई हुई संपत्ति क्लास I वारिसों में बराबर बंटती है, पत्नी, माँ, बेटे और बेटियाँ। शादी से बेटी का हिस्सा कम नहीं होता।
- यह नियम हिंदू, बौद्ध, जैन और सिख पर लगता है। मुस्लिम, ईसाई और पारसी के नियम अलग हैं।
- धोखे या दबाव में साइन करवाया गया हक़-त्याग पेपर रद्द करवाया जा सकता है, पर असली बचाव एक ही है: साइन से पहले मुफ़्त सलाह।
असली ज़िंदगी में
- «शादी हो गई, अब मायके की ज़मीन से क्या लेना», क़ानून उल्टा कहता है; शादीशुदा बेटियाँ बराबर की वारिस हैं। यह सही नहीं है।
- किसी फ़ैमिली फ़ंक्शन पर «बस फ़ॉर्मैलिटी है» कह कर पेपर साइन करवाना, अक्सर वही आपका हिस्सा ख़त्म करने वाला काग़ज़ होता है। यह सही नहीं है।
- «भाई संभाल लेंगे, तुम्हारे नाम की क्या ज़रूरत», भाई का संभालना उनका मालिक बन जाना नहीं है। यह सही नहीं है।
- रजिस्टर्ड हक़ छोड़ने के बदले ज़ुबानी वादे। यह सही नहीं है।
- बिना पढ़े «गवाह के तौर पर» साइन करना, गवाही के पन्ने सहमति के पन्ने बना दिए जाते हैं। यह सही नहीं है।
- «वसीयत में नाम नहीं, अब कुछ नहीं हो सकता» मान लेना, शक वाली वसीयत को चुनौती दी जा सकती है। यह सही नहीं है।
सँभाल कर रखें
- मोटा-मोटा पता रखें कि संपत्ति क्या-क्या है, ज़मीन, घर, डिपॉज़िट। जो काग़ज़ रख सकती हैं, उनकी कॉपियाँ रखें।
- अपने राज्य के लैंड रिकॉर्ड पोर्टल पर रिकॉर्ड ख़ुद देखें। देखने के लिए किसी की इजाज़त नहीं चाहिए।
- विरासत मिलने पर म्यूटेशन करवाएं ताकि रिकॉर्ड में आपका नाम चढ़े।
- कोई भी हक़-त्याग काग़ज़ बिना DLSA की मुफ़्त सलाह के कभी साइन न करें।
- डेथ सर्टिफ़िकेट और लीगल-हेयर सर्टिफ़िकेट की कॉपियाँ संभाल कर रखें।
एक कदम आज
कोई भी काग़ज़ साइन करने से पहले 15100 पर मुफ़्त सलाह लें।
कहाँ जाएँ
DLSA (साइन से पहले मुफ़्त सलाह) · तहसील / रेवेन्यू ऑफ़िस (म्यूटेशन) · लोक अदालत
किससे मिलें: DLSA फ़्रंट ऑफ़िस; तहसीलदार / पटवारी