घर में रहने का हक़
घर आपके नाम पर न हो, तब भी रहने का हक़ है।
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कानून क्या कहता है
- PWDVA धारा 17: घरेलू रिश्ते में हर औरत को साझा घर में रहने का हक़ है, चाहे घर उसके नाम पर हो या न हो। बिना क़ानूनी प्रक्रिया के उसे निकाला नहीं जा सकता।
- धारा 19 में मजिस्ट्रेट आदेश दे सकते हैं: आपको निकाला नहीं जाएगा, घर बेचा नहीं जाएगा, सताने वाले को घर से हटाया जाए, या वैसे ही स्तर का दूसरा घर दिया जाए।
- सुप्रीम कोर्ट (सतीश चंदर आहूजा बनाम स्नेहा आहूजा, 2020) ने साझा घर का दायरा बढ़ाया: इसमें ससुराल का वह घर भी आ सकता है जहाँ आप रहती आई हैं। घर पति के नाम पर होना ज़रूरी नहीं।
असली ज़िंदगी में
- «घर मेरे नाम पर नहीं है, तो निकल जाओ», काग़ज़ पर आपका नाम हो या न हो, रहने के हक़ से इसका लेना-देना नहीं। यह सही नहीं है।
- आप मायके गई हों और पीछे से ताला बदल देना; झगड़े के वक़्त लॉक कर देना। यह सही नहीं है।
- आपका सामान बाहर फेंक देना, या दबाव बनाने के लिए स्टोर-रूम में भेज देना। यह सही नहीं है।
- «यह मेरे माँ-बाप का घर है, इसका कोई हक़ नहीं», 2020 के फ़ैसले के बाद वह भी साझा घर हो सकता है। यह सही नहीं है।
- दबाव में «मैं अपनी मर्ज़ी से घर छोड़ रही हूँ» जैसा कोई काग़ज़ साइन करवाना। यह सही नहीं है।
- मेंटेनेंस या PWDVA केस चलते वक़्त निकालने की धमकी देना। यह सही नहीं है।
सँभाल कर रखें
- रहने का सबूत संभालें: उस पते वाला आधार, राशन कार्ड, बिजली-पानी के बिल, बच्चों के स्कूल रिकॉर्ड।
- ताला लग जाए या निकाल दिया जाए तो उसी हफ़्ते शिकायत करें, देरी आपके ख़िलाफ़ पढ़ी जाती है।
- घर छोड़ने से जुड़ा कोई भी काग़ज़ बिना DLSA की मुफ़्त सलाह के साइन न करें।
- सामान और कमरों की फ़ोटो रखें; निकाला जाए तो अंदर क्या छूटा उसकी लिस्ट बनाएं।
एक कदम आज
उस पते वाले काग़ज़ इकट्ठे करें, आधार, राशन कार्ड, बिजली का बिल।
कहाँ जाएँ
प्रोटेक्शन ऑफ़िसर → मजिस्ट्रेट (धारा 19 का ऑर्डर) · वन स्टॉप सेंटर · पुलिस
किससे मिलें: प्रोटेक्शन ऑफ़िसर